पिछले सात सालों से मेरा काम है फिल्में देखना और पहली बार किसी फिल्म को देखकर लोगों को बताना कि वह मुझे कैसी लगी। जब मैंने शुरुआत की थी, तब पब्लिक ने मुझे सपोर्ट किया, मुझे एक नई पहचान दी। उस सपोर्ट ने मेरे अंदर सिनेमा को लेकर ईमानदारी बनाए रखी।
इन सात सालों में सैकड़ों फिल्में देखीं। कई बार फिल्में कमजोर लगीं, कई बार शानदार। लेकिन कभी ऐसा नहीं लगा कि फिल्म के बीच में ही उठकर थिएटर छोड़ देना चाहिए।
लेकिन 2026 में यह रिकॉर्ड टूट गया।
और वह रिकॉर्ड तोड़ा Kerala Story 2 ने।
Kerala Story 2: उम्मीदें आसमान पर, गिरावट जमीन से नीचे
पहली फिल्म The Kerala Story ने 15 करोड़ के बजट में 300 करोड़ से ज्यादा का वर्ल्डवाइड कलेक्शन कर लिया था। उस फिल्म ने विवाद झेला, आरोप झेले, प्रोपेगेंडा के आरोप भी लगे — लेकिन एक बात थी: उसमें दम था।
जब मैंने वह फिल्म देखी थी, सच कहूँ तो अंदर से हिल गई थी। कई सीन इतने प्रभावशाली थे कि तारीफ करते-करते शब्द कम पड़ गए। बड़ी स्क्रीन पर इतना बोल्ड विषय उठाना आसान नहीं होता। उसके लिए गट्स चाहिए।
इसीलिए जब Kerala Story 2 की घोषणा हुई, तो उम्मीद थी कि यह फिल्म उस सिलसिले को आगे बढ़ाएगी।
लेकिन हुआ बिल्कुल उल्टा।
पोस्टर से ही शुरू हो गए सवाल
जैसे ही Kerala Story 2 का पोस्टर सामने आया, दिमाग में पहला सवाल यही आया —
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पुराने एक्टर्स कहाँ हैं?
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ओरिजिनल डायरेक्टर ने इस पार्ट को क्यों छोड़ दिया?
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क्यों Kerala Story 2 का विजुअल और प्रोडक्शन क्वालिटी लो-फील दे रहा है?
फिल्म देखने के बाद इन सभी सवालों के जवाब मिल गए — और जवाब बेहद निराशाजनक थे।
Kerala Story 2: कहानी या न्यूज़पेपर कटिंग्स का कोलाज?
पहले पार्ट के डायरेक्टर ने साफ कहा था कि उन्होंने कहानी पर 10 साल तक रिसर्च किया। उन्होंने यह भी कहा था कि वह पार्ट 2 इसलिए नहीं बनाएंगे क्योंकि सिर्फ WhatsApp मैसेजेस और न्यूज़पेपर कटिंग्स से सिनेमा नहीं बनता।
Kerala Story 2 देखते हुए यही महसूस हुआ कि शायद इस चेतावनी को नजरअंदाज कर दिया गया।
कुछ पसंदीदा न्यूज कटिंग्स उठाओ, कुछ वायरल मैसेज जोड़ दो, कुछ उत्तेजक डायलॉग डाल दो — और तैयार है फिल्म।
लेकिन सिनेमा ऐसा नहीं बनता।
स्क्रिप्ट लिखने के लिए पेन चाहिए, रिसर्च चाहिए, विज़न चाहिए।
यह फिल्म हिंदू vs मुस्लिम नहीं… इंसान vs मशीन है
ऊपर से देखने पर Kerala Story 2 हिंदू बनाम मुस्लिम का मुद्दा लगती है। लेकिन गहराई में जाओ तो यह फिल्म इंसान बनाम मशीन जैसी लगती है।
क्यों?
क्योंकि इसमें सोचने की जगह नहीं दी गई। सवाल पूछने की जगह नहीं दी गई। बस एकतरफा बयान हैं, जिन्हें 10–15 बार दोहराया गया है, मानो रोबोट प्रोग्राम्ड लाइनें बोल रहे हों।
इमोशन्स के नाम पर सिर्फ चिल्लाना, चीखना और ओवर-ड्रामेटिक बैकग्राउंड म्यूजिक है।
सिनेमा दर्शक को सोचने पर मजबूर करता है। Kerala Story 2 दर्शक को भड़काने की कोशिश करती है।
बेटियों को बचाने का दावा… या उन्हें ही दोषी ठहराना?
फिल्म खुद को “बेटी को बचाने” वाली कहानी की तरह पेश करती है। लेकिन कई सीन ऐसे हैं जो बेहद खतरनाक संदेश देते हैं।
केस 1:
एक लड़की सोशल मीडिया पर रील बनाती है, डांस करती है। फिल्म का टोन यह संकेत देता है कि “ऐसा करेगी तो ऐसा ही होगा।”
यानी मदद करने की जगह लड़की को ही क्राइम की जड़ बताया गया।
केस 2:
एक लड़की झूठे प्यार में फंस जाती है। यहाँ यह दिखाने के बजाय कि परिवार और सिस्टम मिलकर अपराधी को सजा दिला सकते हैं, सीधे यह दिखाया जाता है कि अब तो घर लाश ही जाएगी।
केस 3:
एक मुस्लिम लड़का हिंदू बनकर लड़की को धोखे से घर ले जाता है। यहां तक कि फिल्म में “मां” को भी अलग-अलग कैटेगरी में दिखाया गया — हिंदू मां, मुस्लिम मां।
इतनी ज्यादा ड्रामेटाइजेशन कि पब्लिक के अंदर नफरत उछल-उछलकर बाहर आए — और वह यह सवाल पूछना ही भूल जाए कि “आखिर लॉजिक कहाँ है?”
डायलॉग्स जो खून खौलाने के लिए लिखे गए
फिल्म में कुछ फेमस लाइन्स बार-बार दोहराई गई हैं। मेकर्स को शायद लगा होगा कि थिएटर में ताली और सीटी बजेगी।
हाँ, ताली बज रही है। सीटियां भी पड़ रही हैं।
लेकिन सवाल है — किस बात पर?
क्या किसी भी समुदाय को उकसाने वाली लाइनें, इतिहास के नाम पर भड़काने वाले शब्द — यही सिनेमा है?
फिल्म का एक डायलॉग तो यहां तक कहता है कि एपीजे अब्दुल कलाम की वजह से हिंदू लड़कियां मुसलमानों से फंस जाती हैं।
यह सिर्फ डायलॉग नहीं है — यह एक खतरनाक सामान्यीकरण है।
विक्टिम्स के साथ 0% हमदर्दी
अगर कोई घटना सच में होती है, तो जिसके साथ होती है वह उसे पैसे कमाने का जरिया नहीं बनाता।
Kerala Story 2 में असली विक्टिम्स के दर्द को समझने की जगह उनका उपयोग किया गया है।
सहानुभूति की जगह सनसनी है।
रिसर्च की जगह रिएक्शन है।
संवेदनशीलता की जगह उत्तेजना है।
विवाद से समस्या नहीं… क्वालिटी से है
मैं कंट्रोवर्शियल फिल्मों के खिलाफ नहीं हूँ।
उदाहरण के लिए, Vivek Agnihotri की फिल्म The Kashmir Files ने गहरा घाव दिखाया। वह फिल्म कई लोगों के लिए दर्दनाक अनुभव थी, लेकिन उसमें सिनेमैटिक पावर थी।
विवाद होना गलत नहीं।
एक पक्ष दिखाना भी गलत नहीं।
गलत है — बिना कहानी, बिना रिसर्च, बिना दमदार एक्टिंग के सिर्फ उकसावे पर फिल्म बनाना।
Kerala Story 2 में ना कहानी है, ना एक्टिंग का असर, ना रिसर्च की झलक।
कितना जबरदस्त सिनेमा बन सकता था…
अगर यह फिल्म सच में उन लोगों की आवाज बनती जो असल जिंदगी में अपराध से लड़ रहे हैं…
अगर यह विक्टिम्स की मजबूती दिखाती…
अगर यह कन्वर्ज़न जैसे मुद्दे को डिटेल में समझाती…
तो शायद यह एक ऐतिहासिक फिल्म बन सकती थी।
लेकिन Kerala Story 2 ने आसान रास्ता चुना — पैसा।